मेरी हर बातें
ना चाहता हूँ, पर हर बार ये ख़ता हो जाती है,
मेरी हर बातें उसके दिल को दुखा जाती है।
कोशिश तो मैं करता हूँ कुछ ऐसा ना होने का,
पर ना जाने क्यों ये गुश्ताखियां हर बार हो जाती है।
वह धुप भी है, उजाला भी,
साथ देने का वादा करता
और बनता मेरा सहारा भी।
फिर क्यों भागता हूँ मैं दूर उससे,
क्यों राहें बदल लेता हूँ।
ये मेरी है या उसकी किस्मत,
कि हर बार उससे टकरा जाता हूँ।
मैं कुछ ना बोलूं उससे, बस ख़ामोशी से सुनता हूँ।
कहती जाती बातें वो अपनी, खुलकर उन जंजीरों से,
जिन से अब तक मैं बंधा हूँ।
कहते - कहते वो रुआंसी सी हो जाती है,
मेरी हर बातें उसके दिल को दुखा जाती है।
वो मेरे लिए है, सुबह का कोहरा,
शाम का वह मंजर भी।
खुद को कहाँ तक समेटूं मैं,
वह तो है समंदर भी।
मेरी तकलीफें, क्यों उसके आँखों में पानी ला जाती है,
मेरी हर बातें उसके दिल को दुखा जाती है।
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