समझो अगर तुम
समझो अगर तुम तो मैं समझा सकूँगा,
तुम हो बुरी अगर तो मैं कैसे अच्छा बनूँगा ?
कल जो हुआ है, उसे भूल जाओ,
खड़ी हो दूर क्यों? आकर गले लग जाओ।
करो तुम शिकायत मुझसे, जितनी हो सारी
गर हूँ गुनहगार मैं, क्या सजा है हमार?
कहो तुम अगर कुछ तो खुद को मैं कहूँगा,
जो है सजा मेरी, खुद को मैं दूंगा।
समझो अगर तुम तो मैं समझा सकूँगा,
तुम हो बुरी अगर तो मैं कैसे अच्छा बनूँगा ?
चाहत में मेरी ऐसी क्या कमी थी,
क्यों मैं न पूछा, और तुम क्यों न कही थी?
तब और अब में, क्या फर्क हो गया है
न बदला है चेहरा, क्यों एहसास बदल गया है?
कल जैसे सपने क्यों आँखों में नही है,
मिलकर जो हमने देखा, कहाँ खो गई है?
आँखों में अभी भी जलते है दीप वो
जो तुमने था जलाया कहके अपना मीत हो...
तुम जो अगर न हो, बुझा न सकूँगा
भर आई जो आँखे मेरी, छुपा न सकूँगा।
समझो अगर तुम तो मैं समझा सकूँगा,
तुम हो बुरी अगर तो मैं कैसे अच्छा बनूँगा ?
अब भी उम्मीदों की आग जल रही है,
खौफ है फिजाएँ फिर भी, शाम ढल रही है।
कहीं हो न ऐसा मैं भी ढल जाऊं, काली अंधेरों में गुम हो जाऊं
कल का सूरज निकले पर, मैं न जग पाऊं।
खता मैं न जान सका, सजा कैसे दूंगा?
तुम तो भूल गई पर, मैं न भुला सकूँगा।
समझो अगर तुम तो मैं समझा सकूँगा,
तुम हो बुरी अगर तो मैं कैसे अच्छा बनूँगा ।
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