Wednesday, September 20, 2023

 हर शख्स तन्हा



यहां हर शख्स तन्हा, अकेला है।


कभी ख़ुशी से लिपटा हुआ,

तो कभी ग़मों ने उसे घेरा है।


यहां हर शख्स तन्हा, अकेला हैं।


कभी उलझा हुआ खुद में,

कभी दुनिया का झमेला है।


यहां हर शख्स तन्हा, अकेला है।


मिलती नही किसी को चैन यहां,

कभी परेशां तो कभी थकेला है।


यहां हर शख्स तन्हा, अकेला है।


जाना था, उसे लंबी रेस में, पर

कभी थक गया, मंजिल से पहले,

और कभी अपनों ने रास्ते से धकेला है।


यहां हर शख्स तन्हा, अकेला है।

कुछ वक्त


 कुछ वक्त है मेरा,

थोडा साथ चलो तुम।


कल फिर दूर जाना है,

थोडा साथ चलो तुम।


न 'आज' से है कोई वास्ता,

न कल की कोई फिकर।


कुछ वक्त है मेरा,

थोडा साथ चलो तुम।


कल फिर दूरियां युहीं बढ़ जाएँगी,

रास्ते भी युहीं बदल जायेंगे।


इस पल हो पास तो

थोडा साथ चलो तुम।


कुछ वक्त है मेरा,

थोडा साथ चलो तुम।


ऐ खुदा


ऐ खुदा आज मेरी तक़दीर बदल दे,

बर्षो से जकड़ा हुआ हूँ ,इस जंजीर में

वो आज जंजीर बदल दे।


वह रुखसत हो गई, युहीं बिन कुछ कहे,

अब आज को आखिरी दिन बदल दे,


ऐ खुदा आज मेरी तक़दीर बदल दे।


ना मांगी कुछ, न दिया तूने मुझे कुछ

अब ये हालात बदल दे,

सवाल अभी भी वही है, बस

तू अब जवाब बदल दे


ऐ खुदा आज मेरी तक़दीर बदल दे।


जब भी गुजरा तेरी राहों से,

हर बार देखी, हाथ की रेखाओं को,

अब वो रेखा, वो लकीर बदल दे।


ऐ खुदा आज मेरी तक़दीर बदल दे।


समझो अगर तुम


समझो अगर तुम तो मैं समझा सकूँगा,

तुम हो बुरी अगर तो मैं कैसे अच्छा बनूँगा ?


कल जो हुआ है, उसे भूल जाओ,

खड़ी हो दूर क्यों? आकर गले लग जाओ।


करो तुम शिकायत मुझसे, जितनी हो सारी

गर हूँ गुनहगार मैं, क्या सजा है हमार?


कहो तुम अगर कुछ तो खुद को मैं कहूँगा,

जो है सजा मेरी, खुद को मैं दूंगा।


समझो अगर तुम तो मैं समझा सकूँगा,

तुम हो बुरी अगर तो मैं कैसे अच्छा बनूँगा ?


चाहत में मेरी ऐसी क्या कमी थी,

क्यों मैं न पूछा, और तुम क्यों न कही थी?


तब और अब में, क्या फर्क हो गया है

न बदला है चेहरा, क्यों एहसास बदल गया है?


कल जैसे सपने क्यों आँखों में नही है,

मिलकर जो हमने देखा, कहाँ खो गई है?


आँखों में अभी भी जलते है दीप वो

जो तुमने था जलाया कहके अपना मीत हो...


तुम जो अगर न हो, बुझा न सकूँगा

भर आई जो आँखे मेरी, छुपा न सकूँगा।


समझो अगर तुम तो मैं समझा सकूँगा,

तुम हो बुरी अगर तो मैं कैसे अच्छा बनूँगा ?


अब भी उम्मीदों की आग जल रही है,

खौफ है फिजाएँ फिर भी, शाम ढल रही है।


कहीं हो न ऐसा मैं भी ढल जाऊं, काली अंधेरों में गुम हो जाऊं

कल का सूरज निकले पर, मैं न जग पाऊं।


खता मैं न जान सका, सजा कैसे दूंगा?

तुम तो भूल गई पर, मैं न भुला सकूँगा।


समझो अगर तुम तो मैं समझा सकूँगा,

तुम हो बुरी अगर तो मैं कैसे अच्छा बनूँगा ।


बचपन


हरकते बिगडने लगी,

जब मैं बड़ा होने लगा।


सबों को मुझ में खामिया नजर आने लगी,

मेरा उनपर से असर ख़त्म होने लगा ।


जब हम छोटे थे,

तो हर कोई प्यार करता,

हर कोई चाहता था हमे।


पता नही आज क्यों हमे जवानी से ज्यादा,

बचपन प्यारा लगने लगा।


अब हर कोई डांटता हमे,

तरजीह देता हमे सुधर जाने की।


एक बार फिर जीना चाहता हूँ बचपन,

न जीवन जवानी की।

कुछ हसरत थी मेरी कभी


 कुछ हसरत थी मेरी कभी, कुछ ख्वाहिश थी मेरी कभी।

कुछ सपने थे मेरे कभी, कुछ लोग थे मेरे अपने कभी।


कुछ दरिया थे मेरे कभी, कुछ साहिल थे मेरे कभी।

कुछ बादल थे मेरे कभी, कुछ बारिश थे मेरे कभी।


कुछ वक्त थे मेरे कभी, कुछ पल थे मेरे कभी।

कुछ खुशी थी मेरी कभी, कुछ गम थे मेरे कभी।


कुछ दिन थे मेरे कभी, कुछ चैन थे मेरे कभी।

कुछ रात थे मेरे कभी, कुछ एहसास थे मेरे कभी।


तुम थे मेरे कभी, मैं था तेरा कभी।

मैं पास था तेरे कभी, तुम पास थे मेरे कभी।


बस तेरी याद है अभी, तन्हाई मेरे साथ है अभी।

ना तुम लौट सकती कभी, ना मैं ढूंढ सकता कभी।


कुछ हसरत थी मेरी कभी, कुछ ख्वाहिश थी मेरी कभी।

कुछ सपने थे मेरे कभी, कुछ लोग थे मेरे अपने कभी।

मेरी हर बातें


 ना चाहता हूँ, पर हर बार ये ख़ता हो जाती है,

मेरी हर बातें उसके दिल को दुखा जाती है।


कोशिश तो मैं करता हूँ कुछ ऐसा ना होने का,

पर ना जाने क्यों ये गुश्ताखियां हर बार हो जाती है।


वह धुप भी है, उजाला भी,

साथ देने का वादा करता

और बनता मेरा सहारा भी।


फिर क्यों भागता हूँ मैं दूर उससे,

क्यों राहें बदल लेता हूँ।


ये मेरी है या उसकी किस्मत,

कि हर बार उससे टकरा जाता हूँ।


मैं कुछ ना बोलूं उससे, बस ख़ामोशी से सुनता हूँ।

कहती जाती बातें वो अपनी, खुलकर उन जंजीरों से,

जिन से अब तक मैं बंधा हूँ।


कहते - कहते वो रुआंसी सी हो जाती है,

मेरी हर बातें उसके दिल को दुखा जाती है।


वो मेरे लिए है, सुबह का कोहरा,

शाम का वह मंजर भी।

खुद को कहाँ तक समेटूं मैं,

वह तो है समंदर भी।


मेरी तकलीफें, क्यों उसके आँखों में पानी ला जाती है,

मेरी हर बातें उसके दिल को दुखा जाती है।


अब थक गया हूँ


ऐ जिंदगी, अब थक गया हूँ।

थोड़ा आराम करने दे।


जीने की कोई ख्वाहिश ना रही अब,

कत्लेआम करने दे।


ऐ जिंदगी, अब थक गया हूँ।

थोड़ा आराम करने दे।


चलना ही था मुकद्दर, चलते गए हम

मिलकर बिछड़ना था, बिछड़ गए हम।


बहुत हुआ मुश्किलों का दौर

अब मुश्किलों शाम ढलने दे।


ऐ जिंदगी, अब थक गया हूँ।

थोड़ा आराम करने दे।


गम तो नही है, मंजिल खो जाने का।

कोई शिकवा नही है, उसके छोड़ जाने का।


हमे कब मिला है, चैन यहां।

आज जी भर कर रो लेने दे।


ऐ जिंदगी, अब थक गया हूँ।

थोड़ा आराम करने दे।


यहां सबकुछ है दूसरों का,

हर चीज है पराई।

सांसों का ये बंधन,

हर धड़कन है पराई।


उम्र भर हूँ जगा, ऐ जिंदगी।

आखिरी बार सोने दे।


ऐ जिंदगी, अब थक गया हूँ।

थोड़ा आराम करने दे।

 तू खुदा है मेरी


तू दुआ है मेरी, तू खुदा है मेरी।

हूँ वर्षों से प्यासा, तू घटा है मेरी।


तू आज ऐसे बरस, कि मुझे भीगों दे पूरी।


तू दुआ है मेरी, तू खुदा है मेरी।

हूँ वर्षों से प्यासा, तू घटा है मेरी।


हर इंताजर की इन्तहां हो गई,

यूँ चलते गए हम, कि राहें खो गई।


क्यों समझती नही है तू...

मैं मंजिल हूँ तेरा, तू सफर है मेरी


तू दुआ है मेरी, तू खुदा है मेरी।.

हूँ वर्षों से प्यासा, तू घटा है मेरी।


मैं यहां वहां भटका हर एक बाग में...

तूझे ढूंढा तलाशा, हर पेड़, हर साख पे


क्यों समझती नही है तू...

मैं हूँ तेरा भाँवरां, तू कली है मेरी।


तू दुआ है मेरी, तू खुदा है मेरी।

हूँ वर्षों से प्यासा, तू घटा है मेरी।


हमने छोड़ा अपना घर,

आया तेरे शहर।

ना अब ठिकाना है कोई …


क्यों समझती नही है तू...

मैं हूँ तेरा घर, तू ठिकाना है मेरी।


तू दुआ है मेरी, तू खुदा है मेरी।


तुझसे मैं मिलकर, खुद से मिला हूँ ।


तुझसे मैं मिलकर, खुद से मिला हूँ।

तू जो न मिलती, जाता कहाँ?


पहले भी राहें कम तो नही थी,

पर बिन मंजिल का जाता कहाँ?


तुमसे मिला मैं, ख्वाबें बुनी

ख्यालों की राहों में चल निकला।


मुझे तो पहले, खबर ही नही था,

मेरी भी हसरत, है कुछ यहाँ।


तुझसे मैं मिलकर, खुद से मिला हूँ।

तू जो न मिलती, जाता कहाँ?


अब राहें भी आसां हो चली है,

जिंदगी भी हँसने लगी है।


तू जो न मिलती, जाता कहाँ?